भारतीय संविधान में एक विशेष प्रावधान है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष अंतिम अपील गुनाहों की क्षमा माँगकर सजा कम एवं मृत्यु दंड माफ कराने के लिए की जा सकती है। शायद यह प्रावधान अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है व उस समय स्वतंत्रता संग्रामियों को अंग्रेज सरकार ने खुलेआम फांसी देने की प्रथा बना रखी थी शायद उसी परिपेक्ष में हमारे माननीय कानूनविद संविधान के निर्माता "श्री भीमरावजी अंबेडकर ने इस मुद्दे को भी संविधान में सम्मिलित किया। बंधुओं पिछले 70 वर्षों में गंगा का बहुत पानी बह चुका है । इसी प्रकार भारतीय आचरण और संस्कृति को भी पाश्चात्य संस्कृति ने प्रवेश करते हुए भारतीय संस्कारों को कमजोर करा हैजिस प्रकार वृक्ष में बीमारी लगने पर उसका स्वरूप बदल जाता है परंतु जड़ें फिर भी वृक्ष को शक्ति प्रदान करने का प्रयास करती है ध ठीक उसी प्रकार जब कोई आहात होता है तो हमारे भारतीय संस्कार उसे क्षमा करने के लिए प्रेरित करते हैं व ठीक उसी प्रकार जैसे महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को 17 बार क्षमा किया परन्तु अंत में पृथ्वीराज चौहान को ही मार डाला गया । इतिहास गवाह है कि क्षमा का वह युग समाप्त हो गया जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने गुनाहगार साबित कर दिया उसपर किसी भी प्रकार की दया नहीं करना चाहिए व जब भी किसी संदिग्ध अपराधी के मृत्युदंड की क्षमा के लिए महामहिम राष्ट्रपति से अपील की जानकारी मिलती है तो हमारा खून-खौलने लगता है ऐसे अपराधी को तो न्यायालय की निचली अदालत से मृत्युदंड की घोषणा के साथ ही फाँसी दी जाना चाहिए थी। वर्षों तक भारत सरकार द्वारा उसके रहन-सहन, इलाज, न्यायिक आर्थिक मदद आदि पर अत्याधिकराशि खर्च किया जाता हैं। महामहिम राष्ट्रपति के आदेश में विलम्ब के कारण पुनः वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। इससे पीड़ित एवं पीड़ित परिवार को क्या राहत प्राप्त होगी? वह तो केवल परमात्मा के आगे प्रार्थना करते अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हैं । दिल्ली का निर्भयाकांड प्रत्यक्ष उदाहरण है कि आज 7 वर्ष के अंतरकाल के पश्चात भी चारों दोषी दरिंदे राष्ट्रपति को दया याचिका भेजकर आनंद ले रहें हैं एवं अत्याधिक निर्दयी नाबालिग दरिंदा बालिक होकर स्वतंत्र हो गया। केवल कानून की शक्ति से तो दुष्कर्म रुके नहीं एवं अधिक गैंगरेप (3 से लेकर 14 साल की बच्चियों) के साथ दिनों-दिन हो रहे हैं ये दरिंदे विवाहिता, मां ही नहीं अपितु दादी, नानी को भी नहीं बख्श रहें हैं। लिखने का तात्पर्य महिला किसी भी उम्र में सुरक्षित नहीं है व स्त्री ने उनको जन्म दिया उसी मातृशक्ति (देवी) की मान्यता देते हैं उसी मातृशक्ति के साथ पुरुष को भी नहीं बख्श रहें हैं। लिखने का तात्पर्य महिला किसी भी उम्र में सुरक्षित नहीं है व स्त्री ने उनको जन्म दिया उसी मातृशक्ति (देवी) की मान्यता देते हैं उसी मातृशक्ति के साथ पुरुष इतने क्रर क्यों हो रहे हैं ? कारण स्पष्ट है कि भारतीय संविधान में फांसी के फंदे तक पहुंचते-पहुंचते अपराधी या तो भ्रष्टाचार / राजनीति के कारण बारी हो जाता हें नहीं तो जेल में आनंदमय जीवन व्यतीत करता हैं, उसे इस कुकृत्य करने के प्रति लज्जा या डर नहीं रहता। दुष्कर्म करने वाले के पकडे जाने पर बगैर लम्बी सुनवाई, लम्बी बहस आदि को तिलांजली देते हुए उसे तो जल्द से जल्द अधिक से अधिक छह मास की अवधि में फाँसी के फंदे पर चढा दिया जाना चाहिए (वह कितना ही पहुँच वाला व्यक्ति क्यों न हों) ऐसे अपराधी को तो राष्ट्रपति के यहाँ याचिका करने की पात्रता भी नहीं मिलना चाहिए द्य (विदेशों में यहाँ तक कि अमेरिका व मुस्लिम देशों में आज भी यह लागू हैं द्य) जब तक कठोर शारीरिक मृत्युदंड नहीं दिया जावेगा यह बीमारी नहीं रुकेगी द्य यहाँ मानवता आयोग को भी हस्तक्षेप करने का प्रावधान समाप्त कर देना अति आवश्यक हैं। हाल ही में माय होम से 67 लड़कियाँ बरामद हुई हैं। इन्हें किसी भी परिभाषा में रखें (वेश्या या लाचारी से गलत कार्यों में फँसी) रखें, दुष्कर्म पीड़िता जो कि जीवित बच जाती हैं, अवैध गर्भवती हो जाती हैं य (न्यायालय उन्हें गर्भपात को इजाजत देते देते बच्चा पैदा करवा देता हैं ) उन सभी के लिए कानूनों में उचित संशोधन, शासन व्दारा आर्थिक मदद एवं उनके पुनर्वास की व्यवस्थाओं पर भी कानून के मार्फत प्रावधान किये जाना आवश्यक हैं य क्योंकि अधिकतर यह देखा जा रहा है कि उनकी शिकायत दर्ज करने में पुलिस विभाग आना-कानि करता हैं व कभी-कभी तो एक-एक, दो-दो सप्ताह तक चक्कर लगवाते रहते हैं व तत्पश्चात पीड़ित एवं उसके परिवार पर साम-दाम-दंड-भेद से डरा धमकाकर चुप रहने का दबाव डालकर मामला रफा-दफा करने का प्रयास करते हैं इसमें अधिकारीयों को केवल सस्पेंड करना / ट्रांसफर करना समस्या का समाधान नहीं हैं उन्हें तो जेल की सलाखों के पीछे दण्डित किया जावें तब ही इस अत्याचार पर अंकुश लगाना संभव हैं।
संदिग्ध अपराधियों की क्षमा याचिका क्यों?